राष्ट्रपति मुर्मु ने माता साहिब हसी देवी जी की 200वीं जयंती पर 200 रुपये का स्मारक सिक्का जारी किया
रायपुर ( दस्तक डेस्क) : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित लोक भवन में पूज्य माता साहिब हसी देवी जी की 200वीं जयंती के उपलक्ष्य में 200 रुपये का एक स्मारक सिक्का जारी किया। इस कार्यक्रम में सिंधी समुदाय के सैकड़ों सदस्य उपस्थित थे। पूज्य माता हसी देवी जी सिंधी समुदाय के पूजनीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र ऐतिहासिक शादानी दरबार की पांचवीं प्रमुख थीं।
माता हासी देवी ने शदाणी दरबार की पांचवीं पीठाधीश्वर के रूप में धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ाया. शिक्षा, भक्ति, लंगर, समाज सेवा और जरूरतमंदों की सहायता से जुड़े उनके कार्य आज भी उनकी विरासत का हिस्सा हैं। रायपुर में आयोजित होने वाला यह समारोह माता साहिब हासी देवी के जीवन, सिंधी समाज की धार्मिक परंपरा और मानव सेवा के लिए उनके योगदान को याद करने का अवसर होगा।

माता हासी देवी के जीवन से जुड़ी एक मान्यता अकाल के समय शदाणी दरबार के खाद्य भंडार से संबंधित है. श्रद्धालुओं के अनुसार, अकाल के दौरान उनके आशीर्वाद से दरबार का खाद्य भंडार कभी समाप्त नहीं हुआ। माता हासी देवी ने अपनी आध्यात्मिक शिक्षाओं से कई संतों को भी प्रेरित किया।
शदाणी दरबार के संत ‘मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है’ के आदर्श का पालन करते हैं। दरबार में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, संगीत, सांस्कृतिक मूल्यों और जनसेवा से जुड़ी गतिविधियां संचालित की जाती हैं. यहां नियमित रूप से भजन-कीर्तन, भंडारा, तीर्थयात्रा, धार्मिक त्योहार और संत सभाओं का आयोजन होता है। इन गतिविधियों के माध्यम से धार्मिक परंपराओं और सामाजिक सेवा के कार्यों को आगे बढ़ाया जाता है। हरिद्वार में भारत माता मंदिर के सप्त सरोवर मार्ग पर स्थित पवित्र गंगा घाट और वहां स्थापित पूज्य माता साहिब हासी देवी की प्रतिमा भी उनकी स्मृति से जुड़ी हुई है।

कौन हैं माता हासी देवी?
माता हासी देवी का जन्म 1826 में सिंध राज्य में हुआ था। वह सिंधी समाज की महान विभूति थी. वह रायपुर में मौजूद शदाणी दरबार की पंचम पीठाधीश थीं. बताया जाता है कि वह 26 साल की उम्र में शदाणी दरबार की पहली महिला पीठाधीश्वर बनीं। उनका मन हमेशा से ही भक्ति और सेवा में लगता था। हिंदी, संस्कृत और संगीत की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने काफी काम किया। वह लाखों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत रही हैं। उन्होंने अन्न भंडार से काफी लोगों को मदद की थी। बाद में उन्होंने 30 अप्रैल 1909 को अपनी देह त्याग दी थी।
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