‘क्षितिज’ की सौगात, बेबस बचपन को मिलेगा सुरक्षित आसमान

Aug 18, 2026 - 00:30
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‘क्षितिज’ की सौगात, बेबस बचपन को मिलेगा सुरक्षित आसमान

Baghpat News: कुछ दिन पहले जिला अस्पताल के एसएनसीयू में दो नन्हीं बच्चियां बागपत की संवेदनाओं का केंद्र बनी थीं। एक नवजात नाली में मिली थी, दूसरी रेलवे ट्रैक किनारे झाड़ियों में रोती हुई मिली थी। दोनों के जीवन की शुरुआत बेहद कठिन परिस्थितियों में हुई, लेकिन उनकी कहानी को वहीं खत्म नहीं होने दिया गया।
नव्या और समायरा नाम देकर दी थी नई पहचान
जिला अस्पताल में जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने दोनों बच्चियों को अपनी गोद में लेकर उनका हाल जाना, चिकित्सकों से उनके उपचार और स्वास्थ्य की जानकारी ली और उन्हें ‘नव्या’ और ‘समायरा’ नाम देकर नई पहचान दी। अब स्वतंत्रता दिवस पर इन दोनों सहित ऐसे बच्चों के सुरक्षित भविष्य की दिशा में बागपत ने एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। सरूरपुर कलां में जनपद के पहले ‘क्षितिज बाल/शिशु गृह’ का शुभारंभ हुआ है। इस पहल में इंटरनेशनल गीता गुरुकुल फाउंडेशन एवं भारतपुरिया शिक्षा समिति का सहयोग रहा।
‘क्षितिज’ आश्रय गृह नहीं, एक सुरक्षित बचपन की नई शुरुआत
‘क्षितिज’ महज एक आश्रय गृह नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए सुरक्षित बचपन की नई शुरुआत है, जिन्हें किसी कारणवश तत्काल पारिवारिक संरक्षण उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। यहां बच्चों को केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि भोजन, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, खेल, मनोरंजन, भावनात्मक सहयोग, स्नेह और आवश्यक संरक्षण जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। प्रयास यह है कि कठिन परिस्थितियों से यहां पहुंचने वाला कोई बच्चा स्वयं को अकेला या उपेक्षित महसूस न करे, बल्कि उसे ऐसा वातावरण मिले जहां वह सुरक्षित होकर अपने भविष्य के सपने देख सके।
आजादी के अर्थ को भी एक मानवीय विस्तार
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इस पहल की शुरुआत ने आजादी के अर्थ को भी एक मानवीय विस्तार दिया। देश की आजादी की 80वीं वर्षगांठ पर बागपत से यह संदेश सामने आया कि बच्चों को केवल बाहरी बंधनों से नहीं, बल्कि भूख, अभाव, असुरक्षा, अकेलेपन और अवसरों की कमी से भी आजादी मिलनी चाहिए। जिस तरह देश ने स्वतंत्रता हासिल कर अपने भविष्य की दिशा तय की, उसी तरह हर बच्चे को भी अपने बचपन, शिक्षा, खेल और सपनों के साथ आगे बढ़ने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
‘क्षितिज’ के शुभारंभ को बच्चों के लिए एक आत्मीय उत्सव
‘क्षितिज’ के शुभारंभ को बच्चों के लिए एक आत्मीय उत्सव के रूप में मनाया गया। जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने बच्चों के साथ समय बिताया, उन्हें स्नेह दिया और उनके साथ केक काटकर ‘क्षितिज’ के शुभारंभ का उत्सव मनाया। बच्चों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देकर कार्यक्रम में उल्लास भर दिया। उनकी प्रस्तुतियों और खिलखिलाती मुस्कान ने पूरे वातावरण को जीवंत बना दिया। जिस स्थान की शुरुआत उन बच्चों के लिए की गई है, जिन्हें जीवन में किसी मोड़ पर सहारे की जरूरत पड़ी, वहां पहले ही दिन बच्चों की हंसी और उत्साह ने यह संदेश दिया कि बाल संरक्षण का मतलब केवल सुरक्षा की चारदीवारी नहीं, बल्कि खुशहाल बचपन का वातावरण तैयार करना भी है।
स्वस्थ विकास के लिए पौष्टिक आहार और स्वास्थ्य सेवाएं जरूरी
जिलाधिकारी ने इस अवसर पर बच्चों के अधिकारों को केंद्र में रखते हुए कहा कि हर बच्चे का है अधिकार—रोटी, खेल, पढ़ाई और प्यार। यह संदेश ‘क्षितिज’ की पूरी सोच को स्पष्ट करता है। बच्चे को केवल भोजन और छत मिल जाना पर्याप्त नहीं है। उसके स्वस्थ विकास के लिए पौष्टिक आहार और स्वास्थ्य सेवाएं जरूरी हैं, सीखने के लिए शिक्षा, शारीरिक और मानसिक विकास के लिए खेल तथा आत्मविश्वास और भावनात्मक सुरक्षा के लिए स्नेह और अपनापन जरूरी है। उन्होंने अधिकारियों और कर्मचारियों को निर्देशित किया कि बच्चों की देखभाल में संवेदनशीलता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए और उनकी जरूरतों को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानवीय दायित्व के रूप में देखा जाए।
सुरक्षित प्रतीक्षालय और संरक्षण केंद्र के रूप में कार्य करेगा
‘क्षितिज’ की परिकल्पना का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह ऐसे बच्चों के लिए सुरक्षित प्रतीक्षालय और संरक्षण केंद्र के रूप में कार्य करेगा, जहां से नियमानुसार पात्र और इच्छुक परिवार बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया से जुड़ सकेंगे। दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी प्रावधानों और सक्षम बाल संरक्षण संस्थाओं के माध्यम से ही पूरी होगी, लेकिन स्थानीय स्तर पर सुरक्षित व्यवस्था उपलब्ध होने से ऐसे बच्चों के संरक्षण और आगे के पुनर्वास की राह मजबूत होगी। इस प्रकार बचाव के बाद संरक्षण, संरक्षण के बाद पुनर्वास और जहां संभव हो, विधिसम्मत प्रक्रिया के माध्यम से परिवार तक पहुंच—बच्चे के हित को केंद्र में रखते हुए इस पूरी यात्रा को बेहतर आधार मिलेगा।
ध्यान में रखकर आकर्षक रूप दिया गया
‘क्षितिज’ परिसर को भी बच्चों की जरूरतों और भावनात्मक विकास को ध्यान में रखकर आकर्षक रूप दिया गया है। परिसर में रंगीन वॉल पेंटिंग, बच्चों के अनुकूल चित्रकारी और जीवंत सज्जा की गई है, ताकि यहां रहने वाले बच्चे अपनेपन और सकारात्मकता से भरे माहौल में रहें। बच्चों के रहने, भोजन, स्वच्छता, स्वास्थ्य, खेल और मनोरंजन से जुड़ी व्यवस्थाओं पर ध्यान दिया गया है। उद्देश्य यह है कि यहां आने वाले बच्चे को पहली नजर में ही यह महसूस हो कि यह केवल उसका अस्थायी ठिकाना नहीं, बल्कि उसके जीवन को संभालने और आगे बढ़ाने वाला सुरक्षित स्थान है।
कुछ दिन पहले तक दोनों बच्चियों की पहचान
‘क्षितिज’ की कहानी को नव्या और समायरा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। कुछ दिन पहले तक दोनों बच्चियों की पहचान उनकी कठिन परिस्थितियों से जुड़ी थी। एक नाली में मिली थी तो दूसरी रेलवे ट्रैक के पास झाड़ियों में। लेकिन जिला अस्पताल में उन्हें चिकित्सा मिली, सुरक्षा मिली और प्रशासन का स्नेह मिला। जिलाधिकारी ने स्वयं दोनों बच्चियों को गोद में लेकर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली थी। एसएनसीयू में उन्होंने उपचार, पोषण, संक्रमण से बचाव, चिकित्सकीय निगरानी और आवश्यक सुविधाओं की समीक्षा की थी। उसी दौरान दोनों को नाम मिले-‘नव्या’, यानी नई शुरुआत और नई उम्मीद; और ‘समायरा’, यानी ईश्वर के संरक्षण में रहने वाली।

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