हिन्दी का भारत क़ी राजभाषा से राष्ट्रभाषा का सपना क्यों रह गया अधूरा – डॉ.अनिल कुमार दीक्षित, देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी

Sep 13, 2026 - 18:30
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हिन्दी का भारत क़ी राजभाषा से राष्ट्रभाषा का सपना क्यों रह गया अधूरा – डॉ.अनिल कुमार दीक्षित, देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी

(हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित गोष्ठी)

देहरादून (उत्तराखंड)- इतिहास संकलन समिति द्वारा हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित गोष्ठी में देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी के लॉ विभाग के के डीन प्रोफेसर अनिल कुमार दीक्षित ने चिंतन व्यक्त करते हुए कहा कि,14 सितंबर को पूरे भारत में हिंदी दिवस मनाया जाता है। इसी दिन वर्ष 1949 में भारत की संविधान सभा ने हिन्दी को देवनागरी लिपि सहित राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की

शोध व्याख्यान देते हुए प्रोफेसर दीक्षित ने कहा कि, भारत देश कि कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, देवनागरी लीपी से सुसज्जित हिंदी भारत की राजभाषा है यानि कि राज्य के कामकाज में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा। भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिला हुआ है। भारत में 22 भाषाओं को आधिकारिक दर्जा मिला हुआ है, जिसमें अंग्रेजी और हिंदी भी शामिल है। भारत देश में सर्वोच्च न्यायालय एवं सभी उच्च न्यायालयो की भाषा भी अंग्रेजी ही है

देश की अदालत ने कई बार ये साफ किया है कि ये सभी भाषाएं बराबर हैं और कोई भी भाषा ना किसी से कम है और ना किसी से ज्यादा। भारत में केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक, पश्चिम में गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात, उत्तर-पश्चिम में पंजाब और जम्मू-कश्मीर, पूर्व में ओडिशा और पश्चिम बंगाल, उत्तर-पूर्व में सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा, नगालैंड, मणिपुर, मेघालय और असम ऐसे राज्य हैं जहां हिंदीभाषी बहुत कम है

भारत देश में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली देवनागरी लिपि से सुसज्जित भाषा हिंदी ही है और यही वजह है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिंदी को जनमानस की भाषा कहा था। महात्मा गांधी ने साल 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही थी। महात्मा गांधी के अलावा जवाहरलाल नेहरू भी थे जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की वकालत की थी।

लॉ प्रोफेसर दीक्षित ने बताया कि, इंडिपेंडेंस एक्ट १९४७ के द्वारा भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद ज़ब संविधान को बनाने की तैयारियां शुरू कर दी गई। संविधान में हर पहलू को लंबी बहस से होकर गुजरना पड़ा ताकि समाज के किसी भी तबके को ये ना लगे कि संविधान में उसकी बात नहीं कही गई है। लेकिन सबसे ज्यादा विवादित मुद्दा रहा कि संविधान को किस भाषा में लिखा जाना है, किस भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देना है, इसे लेकर सभा में एक मत पर आना थोड़ा मुश्किल लग रहा था।

महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने हिंदुस्तानी (हिंदी और ऊर्दू का मिश्रण) भाषा का समर्थन किया, इनके साथ कई और सदस्य भी शामिल हुए लेकिन विभाजन की वजह से लोगों के मन में काफी गुस्सा था, इसलिए हिंदुस्तानी भाषा की जगह शुद्ध हिंदी के पक्षधर का पलड़ा ज्यादा भारी होने लगा, उधर दक्षिण भारत के सदस्य हिंदुस्तानी और हिंदी दोनों भाषा क़ी खिलाफत करने लगे

देश क़ी सर्वोच्च संस्था, संविधान सभा में इस मुद्दे को लेकर जोर-शोर से बहस छिड़ गई, दक्षिण भारत के लोग हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के खिलाफ थे। इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब इंडिया आफ्टर गांधी में एक जगह उल्लेखित है कि मद्रास के प्रतिनिधित्व कर रहे टीटी कृष्णामचारी ने कहा कि मैं दक्षिण भारतीय लोगों की ओर से चेतावनी देना चाहूंगा कि दक्षिण भारत में पहले ही कुछ ऐसे घटक हैं जो बंटवारे के पक्ष में हैं, उन्होंने कहा कि मेरे यूपी के मेरे दोस्त पहले यह तय कर लें कि उन्हेें अखंड भारत चाहिए या हिंदी भारत। लंबी बहस के बाद सभा इस फैसले पर पहुंची कि भारत की राजभाषा हिंदी (देवनागिरी लिपि) होगी लेकिन संविधान लागू होने के 15 साल बाद यानि 1965 तक सभी राजकाज के काम अंग्रेजी भाषा में किए जाएंगे।

गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए श्रीमती मीना तिवारी ने, हिंदी समर्थक नेता बालकृष्णन और शर्मा और पुरुषोत्तम दास टंडनका संदर्भ देते हुए संविधान सभा में दोनों नेताओ के रुख का वर्णन करते हुए कहा कि दोनों ने अंग्रेजी का विरोध भी किया था। श्रीमती मीना तिवारी ने इतिहास पर प्रकाश ड़ालते हुए बताया कि 1965 में राष्ट्रभाषा पर फैसला लेना था एवं भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का फैसला तय कर लिया था लेकिन इसके बाद तमिलनाडु में हिंसक प्रदर्शन हुए।

प्रदर्शन के दौरान दक्षिण भारत के कई इलाकों में हिंदी की किताबें जलने लगीं, कई लोगों ने तमिल भाषा के लिए अपनी जान तक दे दी, जिसके बाद कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने अपने फैसले पर नर्मी दिखाई और एलान किया है राज्य अपने यहां होने वाले सरकारी कामकाज के लिए कोई भी भाषा चुन सकता है।

कांग्रेस के फैसले में कहा गया कि केंद्रीय स्तर पर हिंदी और अंग्रेजी दोनो भाषाओं का इस्तेमाल किया जाएगा और इस तरह हिंदी कड़े विरोध के बाद देश की सिर्फ राजभाषा बनकर ही रह गई, राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई। गोष्ठी में रजत कुमार, डॉ. सागर सक्सेना, रोहन कुमार, श्रीमती प्रियंका शुक्ला , श्रीमिती संध्या अग्निहोत्री, अमिय कुमार आदि शामिल हुए

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