प्रकृति और संस्कृति के समन्वय से सतत विकास का संकल्प
SMS में भू-सांस्कृतिक विचार-मंथन का समापन
नई दिल्ली : हरिजन सेवक संघ, गांधी आश्रम, किंग्सवे कैंप, नई दिल्ली में 11 से 13 सितंबर 2026 तक आयोजित तीन दिवसीय भू-सांस्कृतिक कार्यशाला ‘प्रकृति–संस्कृति विचार-मंथन’ का आज माननीय मंत्री प्रहलाद पटेल की गरिमामयी उपस्थिति में समापन हुआ। कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से आए विद्वानों, किसानों, बीहड़ भूमि पर खेती करने वाले कृषकों तथा सरकारी संस्थानों के अनुभवी प्रतिनिधियों सहित 100 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की। कार्यशाला में तेलंगाना, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा भारत सरकार द्वारा अधिकृत दिल्ली प्रदेश के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
भू-सांस्कृतिक मानचित्र की अवधारणा पर विचार
तीन दिनों तक चले विचार-विमर्श के दौरान प्रकृति, संस्कृति, जल, कृषि, पर्यावरण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा सतत विकास से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर गहन चर्चा की गई। कार्यशाला में भू-सांस्कृतिक मानचित्र की अवधारणा के अंतर्गत निम्नलिखित सात प्रमुख आयामों पर विचार-विमर्श किया गया—
भूविज्ञान एवं धरती माता।
जलविज्ञान एवं जलप्रवाह।
कृषि एवं संस्कृति।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं आजीविका।
पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता।
जलवायु एवं पर्यावरणीय परिवर्तन।
भारतीय संस्कृति, परंपरा एवं प्रकृति संरक्षण
वक्ताओं ने कहा कि भारत की पारंपरिक जीवनशैली में प्रकृति और संस्कृति का गहरा अंतर्संबंध रहा है। वर्तमान समय में जल संकट, जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण तथा ग्रामीण आजीविका से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए स्थानीय ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामुदायिक सहभागिता को समन्वित रूप से आगे बढ़ाना आवश्यक है।

लेखन एवं पुस्तक का विमोचन
समापन समारोह में जलपुरुष डॉ. राजेंद्र सिंह, तरुण भारत संघ तथा पर्यावरणविद् एवं महानिदेशक (तकनीकी), स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेस (एस.एम.एस.), लखनऊ, प्रोफेसर भरत राज सिंह द्वारा लिखित पुस्तक : बमाया एवं कोटवाली नदी पुनर्जीवन का विमोचन मंत्री प्रहलाद पटेल, मध्य-प्रदेश की उपस्थिति में किया गया। इस लेखन में प्रकृति, संस्कृति, जल संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन तथा सनातन विकास से जुड़े विभिन्न पहलुओं के साथ-साथ सूखी नदियों को नीरामय किया जाना समाहित किया गया है। प्रतिभागियों ने इसे वर्तमान सामाजिक एवं पर्यावरणीय चुनौतियों के संदर्भ में एक उपयोगी पहल बताया।
तीन दिवसीय विचार-विमर्श के निष्कर्ष
कार्यशाला के दौरान प्राप्त सुझावों एवं अनुभवों को समेकित करते हुए यह निष्कर्ष सामने आया कि भू-सांस्कृतिक दृष्टिकोण को केवल शैक्षणिक विमर्श तक सीमित न रखकर ग्रामीण विकास, जल संरक्षण, कृषि सुधार, पर्यावरण संरक्षण तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण से जोड़ा जाना चाहिए। प्रतिभागियों ने स्थानीय स्तर पर जल, भूमि, वनस्पति, कृषि एवं संस्कृति के संरक्षण के लिए सामुदायिक प्रयासों को प्रोत्साहित करने तथा वैज्ञानिक संस्थानों, किसानों, सामाजिक संगठनों एवं सरकारी विभागों के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित करने पर बल दिया।
सरकार को सौंपे जाएंगे सुझाव
समापन समारोह में निर्णय लिया गया कि तीन दिनों के विचार-विमर्श से प्राप्त महत्वपूर्ण सुझावों एवं निष्कर्षों का संकलन कर संबंधित सरकारी विभागों तथा सरकार को प्रस्तुत किया जाएगा, ताकि उन्हें नीति-निर्माण एवं विकास योजनाओं में प्रभावी रूप से शामिल किया जा सके। कार्यशाला के आयोजकों ने कहा कि ‘प्रकृति–संस्कृति विचार-मंथन’ का उद्देश्य प्रकृति संरक्षण, सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन तथा सतत विकास के लिए एक साझा राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित करना है। यह आयोजन विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुआ।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0